नीरज द्विवेदी, लखनऊ। लखनऊ की डालीबाग स्थित सरदार पटेल आवासीय योजना इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। वजह है सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी का वह विवाद, जिसकी कीमत अब आम लोगों को चुकानी पड़ सकती है।
यह योजना उस भूमि पर विकसित की गई थी, जिसे पहले कब्जामुक्त कराया गया था। इसके बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने यहां बहुमंजिला आवासीय परियोजना का निर्माण कराया। योजना के तहत 72 फ्लैट बनाए गए, जिनके लिए हजारों लोगों ने आवेदन किया था। लंबे इंतजार के बाद पात्र लाभार्थियों को फ्लैट आवंटित किए गए और पिछले वर्ष एक कार्यक्रम में उन्हें प्रतीकात्मक रूप से चाबियां भी सौंपी गईं।

लेकिन अब इस पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। सिंचाई विभाग ने दावा किया है कि परियोजना का कुछ हिस्सा विभाग की भूमि और बंधे की सीमा में आता है। इसी आधार पर विभाग की ओर से नोटिस जारी किया गया है। नोटिस में संबंधित हिस्से को लेकर आपत्ति जताई गई है और निर्धारित समय के भीतर जवाब मांगा गया है।
इस घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भूमि को लेकर कोई विवाद था तो निर्माण कार्य शुरू होने से पहले उसकी जांच क्यों नहीं हुई? जब नक्शा स्वीकृत हुआ, निर्माण कार्य चला और परियोजना पूरी हुई, तब किसी विभाग ने आपत्ति क्यों नहीं जताई? यदि जमीन पर अधिकार को लेकर विवाद था, तो उसका समाधान पहले क्यों नहीं किया गया?
अब सबसे बड़ी चिंता उन परिवारों की है जिन्होंने अपनी जमा-पूंजी लगाकर घर खरीदा है। उनके सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। एक तरफ उन्हें वैध प्रक्रिया के तहत आवंटन मिला, दूसरी तरफ अब उसी परियोजना को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी परियोजना में विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय होना बेहद जरूरी है। यदि विभाग समय रहते आपसी संवाद और दस्तावेजों की जांच कर लें तो ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सकता है। अन्यथा सबसे अधिक नुकसान उन नागरिकों को उठाना पड़ता है, जिनका पूरे विवाद से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।
फिलहाल सभी की निगाहें प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हैं। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इस मामले का समाधान जल्द निकलेगा और जिन परिवारों ने अपने घर का सपना पूरा करने के लिए वर्षों की मेहनत की कमाई लगाई है, उन्हें किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
डालीबाग का यह मामला केवल एक आवासीय परियोजना का विवाद नहीं है, बल्कि यह सरकारी विभागों के बीच समन्वय, जवाबदेही और प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस विवाद का समाधान किस प्रकार निकलता है और राहत आखिर किसे मिलती है।



