अपर मुख्य सचिव डॉ. अमित कुमार घोष बोले- सेप्सिस में हर मिनट अहम, सही समय पर इलाज से बच सकती है जान
नीरज द्विवेदी। लखनऊ, 12 सितंबर 2026।
लखनऊ। सेप्सिस जैसी जानलेवा बीमारी से निपटने और दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों की बढ़ती चुनौती के बीच किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) में देशभर के विशेषज्ञ जुटे। विश्व सेप्सिस दिवस के अवसर पर पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से 12 और 13 सितंबर को ‘सेप्सिस अपडेट 2026’ का आयोजन किया जा रहा है।
इस वर्ष विश्व सेप्सिस दिवस की थीम ‘सेप्सिस में निवेश करें–जानें बचाएं’ है। कॉन्फ्रेंस में सेप्सिस की रोकथाम, शुरुआती पहचान, त्वरित उपचार, आधुनिक क्रिटिकल केयर और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विशेषज्ञ मंथन कर रहे हैं।
एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर बनेगी राज्य नीति
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. अमित कुमार घोष ने एंटीबायोटिक्स के अनियंत्रित इस्तेमाल पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि बिना चिकित्सकीय सलाह एंटीबायोटिक लेने और इनके गलत इस्तेमाल से दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। इसे नियंत्रित करने के लिए एंटीबायोटिक्स के विवेकपूर्ण उपयोग को लेकर राज्य स्तरीय नीति तैयार करने की दिशा में कदम उठाया जाएगा।
डॉ. घोष ने कहा कि सेप्सिस के मामले में हर मिनट महत्वपूर्ण है। बीमारी की जल्द पहचान और समय पर सही उपचार मरीज की जान बचाने में निर्णायक हो सकता है।
‘सही एंटीबायोटिक, सही डोज और सही समय’ जरूरी
KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभागाध्यक्ष एवं आयोजन सचिव प्रो. डॉ. वेद प्रकाश ने कहा कि संक्रमण के प्रति शरीर की गंभीर प्रतिक्रिया से सेप्सिस की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जो तेजी से जानलेवा रूप ले सकती है।
उन्होंने कहा कि सेप्सिस के उपचार में सही एंटीबायोटिक, सही खुराक और सही समय बेहद महत्वपूर्ण हैं। साथ ही एंटीबायोटिक्स का अनावश्यक इस्तेमाल रोकना भी उतना ही जरूरी है।
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
विशेषज्ञों के अनुसार बुखार या शरीर का तापमान असामान्य होना, हृदय गति बढ़ना, तेजी से सांस लेना, सांस लेने में परेशानी, भ्रम या मानसिक स्थिति में बदलाव और निम्न रक्तचाप सेप्सिस के संभावित संकेत हो सकते हैं।
संक्रमण के साथ ऐसे लक्षण सामने आने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।
ड्रग रेजिस्टेंस बनी बड़ी चुनौती
कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को गंभीर वैश्विक चुनौती बताया। दवाओं के प्रति संक्रमणकारी जीवों में बढ़ता प्रतिरोध सेप्सिस के उपचार को कठिन बना रहा है।
विशेषज्ञों ने संक्रमण की जल्द पहचान, माइक्रोबायोलॉजिकल जांच, संक्रमण के स्रोत का नियंत्रण और जरूरत के अनुसार एंटीबायोटिक के चयन पर जोर दिया।
देशभर के विशेषज्ञों ने साझा किया अनुभव
दो दिवसीय कार्यक्रम में सेप्सिस की शुरुआती पहचान एवं निदान, रिससिटेशन और फ्लूइड मैनेजमेंट, एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी, सेप्टिक शॉक, निमोनिया, यूरोसेप्सिस, एक्यूट किडनी इंजरी, इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड मरीजों में सेप्सिस और ड्रग-रेसिस्टेंट संक्रमणों के प्रबंधन पर विशेषज्ञ व्याख्यान दे रहे हैं।
कार्यक्रम में RMLIMS के पूर्व निदेशक प्रो. डॉ. दीपक मालवीय, AIIMS पटना के पूर्व निदेशक डॉ. जी.के. सिंह, KGMU के डीन एकेडमिक्स प्रो. डॉ. वीरेंद्र अतम समेत कई वरिष्ठ विशेषज्ञ शामिल हुए।
KGMU की क्रिटिकल केयर सुविधा भी चर्चा में
KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग में 26 बेड की श्वसन गहन चिकित्सा इकाई है। विभाग के अनुसार गंभीर मरीजों के उपचार में आधुनिक क्रिटिकल केयर प्रोटोकॉल और संक्रमण नियंत्रण को प्राथमिकता दी जाती है।
विश्व सेप्सिस दिवस पर विशेषज्ञों का संदेश स्पष्ट है कि सेप्सिस से लड़ाई में समय सबसे बड़ा हथियार है। संक्रमण की समय पर पहचान, तत्काल उपचार और एंटीबायोटिक्स का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करके गंभीर जटिलताओं और मौत के खतरे को कम किया जा सकता है।




